Monday, 12 September 2011

श्री गिरिराज जी


भगवान श्री कृष्ण बलराम जी के साथ वृन्दावन में रहकर अनेकों प्रकार की लीलाएँ कर रहे थे। उन्होंने एक दिन देखा कि वहाँ के सब गोप इन्द्र-यज्ञ करने की तैयारी कर रहे हैं। भगवान श्री कृष्ण सबके अन्तर्यामी और सर्वज्ञ हैं उनसे कोई बात छिपी नहीं थी। फ़िर भी विनयावनत होकर उन्होंने नन्दबाबा से पूँछा- "बाबा आप सब जे का कर रहे हो? ।" तो नन्दबाबा और सभी ब्रजवासी बोले - "लाला, हम इन्द्र की पूजा करवे की तैयारी कर रहे हैं। वो ही हमें अन्न, फ़ल आदि देवै।" इस पर कन्हैया ने सभी ब्रजवासियों से कहा - "अन्न, फ़ल और हमारी गायों को भोजन तो हमें जे गोवर्धन पर्वत देवै। तुम सब ऐसे इन्द्र की पूजा काहे कू करौ। मैं तुम सबन ते गोवर्धन महाराज की पूजा कराउंगो जो तुम्हारे सब भोजन, पकवान आदिन कू पावैगो और सबन कू आशीर्वाद भी देवैगौ।" इस पर सभी ब्रजवासी और नंदबाबा कहने लगे - लाला! हम तो पुराने समय ते ही इन्द्र कू पूजते आ रहे हैं और सभी सुखी हैं, तू काहे कू ऐसे देवता की पूजा करावै जो इन्द्र हम ते रूठ जाय और हमारे ऊपर कछु विपदा आ जावै।" तो लाला ने कहा - ’आप सब व्यर्थ की चिन्ता कू छोड़ कै मेरे गोवर्धन की पूजा करौ।" तो सभी ने गोवर्धन महाराज की पूजा की और छप्पन भोग, छत्तीस व्यंजन आदि सामग्री का भोग लगाया। भगवान श्री कृष्ण जी गोपों को विश्वास दिलाने के लिये गिरिराज पर्वत के ऊपर दूसरे विशाल रूप में प्रकट हो गये और उनकी सभी सामग्री खाने लगे। यह देख सभी ब्रजवासी बहुत प्रसन्न हो गये।
जब अभिमानी इन्द्र को पता लगा कि समस्त ब्रजवासी मेरी पूजा को बंद करके किसी और की पूजा कर रहे हैं, तो वह सभी पर बहुत ही क्रोधित हुए। इन्द्र ने तिलमिला कर प्रलय करने वाले मेघों को ब्रज पर मूसलाधार पानी बरसाने की आज्ञा दी। इन्द्र की आज्ञा पाकर सभी मेघ सम्पूर्ण ब्रज मण्डल पर प्रचण्ड गड़गड़ाहट, मूसलाधार बारिश, एवं भयंकर आँधी-तूफ़ान से सारे ब्रज का विनाश करने लगे। यह देख सभी ब्रजवासी दुखी होकर श्री कृष्ण जी से बोले - "लाला तेरे कहवे पै हमने इन्द्र की पूजा नाय की जाते वो नाराज है गयौ है और हमें भारी कष्ट पहुँचा रहौ है अब तू ही कछु उपाय कर।" श्री कृष्ण जी ने सम्पूर्ण ब्रज मण्डल की रक्षा हेतु गोवर्धन पर्वत को खेल खेल में उठा लिया एवं अपनी बायें हाथ की कनिका उंगली पर धारण कर लिया और समस्त ब्रजवासियों, गौओं को उसके नीचे एकत्रित कर लिया। श्री कृष्ण जी ने तुरन्त ही अपने सुदर्शन चक्र को सम्पूर्ण जल को सोखने के लिये आदेशित किया। श्री कृष्ण जी ने सात दिन तक गिरिराज पर्वत को उठाये रखा और सभी ब्रजवासी आनन्दपूर्वक उसकी छ्त्रछाया में सुरक्षित रहे। इससे आश्चार्यचकित इन्द्र को भगवान की ऐश्वर्यता का ज्ञान हुआ एवं वो समझ गये कि यह तो साक्षात परम परमेश्‍वर श्री कृष्ण जी हैं। इन्द्र ने भगवान से क्षमा-याचना की एवं सभी देवताओं के साथ स्तुति की।

Sunday, 11 September 2011

बरसाना धाम


        किशोरी श्री राधा जू की कृपा कटाक्ष के बिना मधुर रस का आस्वादन नहीं हो सकता। श्री कृष्ण भी इनके प्रेम में मतवाले तथा इनकी चरण रज के लिये लालायित रहते हैं। वैसे तो श्री राधा तथा श्री कृष्ण एक ही रस समुद्र के दो महान रत्न हैं, आनन्द आस्वादन हेतु ये दो देह धारण कर लीलायें कर रहे हैं। जिस प्रकार श्री राधा जी के बिना कृष्ण जी की बाल लीलाओं का वर्णन अधूरा है उसी प्रकार बरसाना के बिना ब्रज का वर्णन नहीं किया जा सकता। बरसाना का प्राचीन नाम वृषभानुपुर है।
        ब्रज में निवास करने के लिये स्वयं ब्रह्मा जी भी आतुर रहते थे एवं श्री कृष्ण लीलाओं का आनन्द लेना चाहते थे। अतः उन्होंने सतयुग के अंत में विष्णु जी से प्रार्थना की कि आप जब ब्रज मण्डल में अपनी स्वरूपा श्री राधा जी एवं अन्य गोपियों के साथ दिव्य रास-लीलायें करें तो मुझे भी उन लीलाओं का साक्षी बनायें एवं अपनी वर्षा ऋतु की लीलाओं को मेरे शरीर पर संपन्न कर मुझे कृतार्थ करें।
        श्री ब्रह्मा जी की इस प्रार्थना को सुनकर भगवान विष्णु जी ने कहा - "हे ब्रह्मा! आप ब्रज में जाकर वृषभानुपुर में पर्वत रूप धारण कीजिये। पर्वत होने से वह स्थान वर्षा ऋतु में जलादि से सुरक्षित रहेगा, उस पर्वतरूप तुम्हारे शरीर पर मैं ब्रज गोपिकाओं के साथ अनेक लीलायें करुंगा और तुम उन्हें प्रत्यक्ष देख सकोगे। अतएव बरसाना में ब्रह्मा जी पर्वत रूप में विराजमान हैं। पद्मपुराण के अनुसार यहाँ विष्णु और ब्रह्मा नाम के दो पर्वत आमने सामने विद्यमान हैं। दाहिनी ओर ब्रह्म पर्वत और बायीं विष्णु पर्वत विद्यमान है।
        श्री नन्दबाबा एवं श्री वृषभानु जी का आपस में घनिष्ट प्रेम था। कंस के द्वारा भेजे गये असुरों के उपद्रवों के कारण जब श्री नन्दराय जी अपने परिवार, समस्त गोपों एवं गौधन के साथ गोकुल-महावन छोड़कर नन्दगाँव में निवास करने लगे, तो श्री वृषभानु जी भी अपने परिवार सहित उनके पीछे-पीछे रावल को त्याग कर चले आये और नन्दगाँव के पास बरसाना में आकर निवास करने लगे। यहाँ के पर्वतों पर श्री राधा-कृष्ण जी ने अनेक लीलाएँ की हैं। अपनी मधुर तोतली बोली से श्रीवृषभानु जी एवं कीरति जी को सुख प्रदान करती हुईं श्री राधा जी बरसाने की प्रत्येक स्थली को अपने चरण-स्पर्श से धन्य करती हैं। बरसाना गाँव लट्ठमार होली के लिये प्रसिद्ध है जिसे देखने के लिये हजारों भक्त एकत्र होते हैं।




ब्रज धाम


व्रज समुद्र मथुरा कमल, वृन्दावन मकरंद।
व्रजबनिता सब पुष्प हैं, मधुकर गोकुलचंद॥
        निखिल विश्व की आत्मा श्री कृष्ण चराचर प्रकृति के एक मात्र अधीश्वर हैं, समस्त क्रियाओं के कर्ता, भोक्ता और साक्षी भी हैं। वही सर्वव्यापक हैं, अन्तर्यामी हैं। सच्चिदानन्द श्री कृष्ण जी का निज धाम, उनकी बाल लीलाओं का साक्षी एवं उनकी प्रियतमा श्री राधारानी का हृदय है ब्रज धाम। भारत वर्ष में अनेक तीर्थ स्थल जैसे अयोध्या, द्वारिका, चित्रकूट, चार धाम आदि अवस्थित हैं। इन्हीं सब धामों में ब्रज मण्डल अपना अनूठा महत्व रखता है। भक्ति रस में ब्रज रस की माधुरी अनुपमेय है। भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज में प्रकट होकर रस की जो मधुरतम धारा प्रवाहित की उसकी समस्त विश्व में कोई तुलना नहीं है। बड़े-बड़े ज्ञानी, योगी, ऋषि मुनि, देवगण सहस्त्र वर्ष प्रभु के दर्शन पाने को तप करते हैं फ़िर भी वो प्रभु का दर्शन प्राप्त नहीं कर पाते हैं वहीं इस ब्रज की पावन भूमि में परम सच्चिदानन्द श्री कृष्ण सहज ही सुलभ हो जाते हैं।
        समस्त ब्रज मण्डल को रसिक संतजनों ने बैकुण्ठ से भी सर्वोपरि माना है। इससे ऊपर और कोई भी धाम नहीं है जहाँ प्रभु ने अवतार लेकर अपनी दिव्य लीलायें की हों। इस ब्रज भूमि में नित्य लीला शेखर श्रीकृष्णजी की बांसुरी के ही स्वर सुनाई देते हैं अन्य कोलाहल नहीं। यहाँ तो नेत्र और श्रवणेन्द्रियाँ प्रभु की दिव्य लीलाओं का दर्शन और श्रवण करते हैं। यहाँ के रमणीय वातावरण में पक्षियों का चहकना, वायु से लताओं का हिलना, मोर बंदरों का वृक्षों पर कूदना, यमुना के प्रवाहित होने का कलरव, समस्त ब्रज गोपिकाओं का यमुना से अपनी- अपनी मटकी में जल भर कर लाना और उनकी पैंजनियों की रुनझुन, गोपिकाओं का आपस में हास-परिहास, ग्वालवालों का अपने श्याम सुन्दर के साथ नित्य नयी खेल-लीलाओं को करना, सभी बाल सखाओं से घिरे श्री कृष्ण का बड़ी चपलता से गोपियों का मार्ग रोकना और उनसे दधि का दान माँगना। यमुना किनारे कदम्ब वृक्ष के ऊपर बैठकर बंशी बजाना और बंशी की ध्वनि सुनकर सभी गोपिकाओं का यमुना तट पर दौड़कर आना और लीला करना यही सब नन्द नन्दन की नित्य लीलाएं इस ब्रज में हुई हैं। यहाँ की सभी कुँज-निकुँज बहुत ही भाग्यशाली हैं क्योंकि कहीं प्यारे श्याम सुन्दर का किसी लता में पीताम्बर उलझा तो कहीं किसी निकुँज में श्यामाजू का आँचल उलझा। प्रभु श्री श्याम सुन्दर की सभी निकुँज लीलायें सभी भक्तों, रसिकजनों सन्तों को आनन्द प्रदान करती हैं।
        ब्रज का हर वृक्ष देव हैं, हर लता देवांगना है, यहाँ की बोली में माधुर्य है, बातों में लालित्य है, पुराणों का सा उपदेश है, यहाँ की गति ही नृत्य है, रति को भी यह स्थान त्याग करने में क्षति है, कण-कण में राधा-कृष्ण की छवि है, दिशाओं में भगवद नाम की झलक, प्रतिपल कानों में राधे-राधे की झलक, देवलोक-गोलोक भी इसके समक्ष नतमस्तक हैं। सम्पूर्ण ब्रज-मण्डल का प्रत्येक रज-कण,  वृक्ष, पर्वत, पावन  कुण्ड-सरोवर और श्री यमुनाजी श्रीप्रिया-प्रियतम की नित्य निकुंज लीलाओं के साक्षी हैं। श्री कृष्ण जी ने अपने ब्रह्मत्व का त्याग कर सभी ग्वाल बालों और ब्रज गोपियों के साथ अनेक लीलाएँ की हैं। यहाँ उन्होने अपना बचपन बिताया। जिसमें उन्होने ग्वाल बालों के साथ क्रीड़ा, गौ चारण, माखन चोरी, कालिया दमन आदि अनेक लीलाएँ की हैं। भगवान कृष्ण की इन लीलाओं पर ही ब्रज के नगर, गाँव, कुण्ड, घाट आदि स्थलों का नामकरण हुआ है।

बाल गोपाल की मोहक लीलाएं


कृष्ण एक किंवदंति..., एक कथा..., एक कहानी...। जिसके अनेक रूप और हर रूप की लीला अद्भुत। प्रेम को परिभाषित करने वाले, उसे जीने वाले इस माधव ने जिस क्षेत्र में हाथ रखा वहीं नए कीर्तिमान स्थापित किए। 

मां के लाड़ले, जिनके संपूर्ण व्यक्तित्व में मासूमियत समाई हुई है। कहते तो लोग ईश्वर का अवतार हैं, पर वे बालक हैं तो पूरे बालक। मां से बचने के लिए कहते हैं- मैया मैंने माखन नहीं खाया। मां से पूछते हैं- मां वह राधा इतनी गोरी क्यों है, मैं क्यों काला हूं? शिकायत करते हैं कि मां मुझे दाऊ क्यों कहते हैं कि तू मेरी मां नहीं है। 'यशोदा मां' जिसे अपने कान्हा से कोई शिकायत नहीं है? उन्हें अपने लल्ला को कुछ नहीं बनाना, वह जैसा है उनके लिए पूरा है। 

'मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी।' 

ND
यहां तक कि मुख में पूरी पृथ्वी दिखा देने, न जाने कितने मायावियों, राक्षसों का संहार कर देने के बाद भी मां यशोदा के लिए तो वे घुटने चलते लल्ला ही थे जिनका कभी किसी काम में कोई दोष नहीं होता। सूर के पदों में अनोखी कृष्ण बाल लीलाओं का वर्णन है। सूरदास ने बालक कृष्ण के भावों का मनोहारी चित्रण प्रस्तुत किया जिसने यशोदा के कृष्ण के प्रति वात्सल्य को अमर कर दिया। यशोदा के इस लाल की जिद भी तो उसी की तरह अनोखी थी 'मां मुझे चांद चाहिए।

श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व के अनेक पहलू हैं। वे मां के सामने रूठने की लीलाएं करने वाले बालकृष्ण हैं तो अर्जुन को गीता का ज्ञान देने वाले योगेश्वर कृष्ण। इस व्यक्तित्व का सर्वाधिक आकर्षक पहलू दूसरे के निर्णयों का सम्मान है। कृष्ण के मन में सबका सम्मान है। वे मानते हैं कि सभी को अपने अनुसार जीने का अधिकार है। 

अपनी बहन के संबंध में लिए गए अपने दाऊ (बलराम) के उस निर्णय का उन्होंने प्रतिकार किया जब दाऊ ने यह तय कर लिया कि वह बहन सुभद्रा का विवाह अपने प्रिय शिष्य दुर्योधन के साथ करेंगे। तब कृष्ण ही ऐसा कह सकते थे कि 'स्वयंवर मेरा है न आपका, तो हम कौन होते हैं सुभद्रा के संबंध में फैसला लेने वाले।' समझाने के बाद भी जब दाऊ नहीं माने तो इतने पूर्ण कृष्ण ही हो सकते हैं कि बहन को अपने प्रेमी के साथ भागने के लिए कह सके।

राजसूय यज्ञ में पत्तल उठाने वाले, अपने रथ के घोड़ों की स्वयं सुश्रूषा करने वाले कान्हा के लिए कोई भी कर्म निषिद्ध नहीं है। 

ND
महाभारत युद्ध, जिसके नायक भी वे हैं पर कितनी अनोखी बात है कि इस युद्ध में उन्होंने शस्त्र नहीं उठाए! इस अनूठे व्यक्तित्व को किस ओर पकड़ो कि यह अंक में समा जाए पर कोशिश हर बार अधूरी ही रह जाती है। महाभारत एक विशाल सभ्यता के नष्ट होने की कहानी है। इस घटना के अपयश को श्रीकृष्ण जैसा व्यक्तित्व ही शिरोधार्य कर सकता है। 

कितनी बड़ी प्रतीक कथा है जिसमें श्रीकृष्ण ने तय किया कि अब सुधार असंभव है। जब राजभवन में ही स्त्रियों की यह स्थिति है तो बाकी समाज का क्या हाल होगा। 

राज-दरबार में ही राजवधू का चीरहरण सारे कथित प्रबुद्ध लोगों के सामने हो सकता है तब ऐसे समाज में कोई सुरक्षित भी नहीं है, साथ ही ऐसे समाज को खड़े रहने का कोई अधिकार भी नहीं। इसलिए उन्होंने संदेश दिया- हे अर्जुन उठा शस्त्र! तू तो मात्र निमित्त होगा!

radha krishna ka aakarsan


एक राधा और कृष्ण का आकर्षक अनेक रंगों और रूपों में चित्रित हुआ है।
'कर मोहन सों यारी, हे राधा प्यारी !'
जब मोहन ने खर्चा भेजा चार मोहर एक सारी
एक सारी पहन राधा मँदिर में भैठीं ङँस रहे लोग-लुगाई !
जब मोहन ने पाती भेजी लिख दिया प्यारी प्यारी एक '
लोक-मन ने उनके प्रेम को कभी स्वकीया की मान्यता नहीं दी इसीलिये इस गीत में पत्र और खर्चा भेजने की बात हैं । हर युग अपनी मान्यताओं के अनुरूप अभिव्यक्ति देता रहा और यह संबंध स्वकीया से भी अधिक दृढ़ और विश्वसनीय होकर सर्वस्वीकृत हो गया । पारस्परिक निष्ठा और गहनता ने उसे मान दिया उसे पूजा की वस्तु बना दिया ।
अपनी पत्नियों के साथ कृष्ण के मन्दिर कहीं हों या न हों राधा के साय़ वे हर मंदिर और हर गीत में जुड़े रहे हैं । उनका प्रेम शारीरिकता और सामाजिकता की सीमा से परे था । परकीया या मित्रता जो जैसा माने ! राधाकृष्म के प्रेम को कितने भावों में कितने रूपों में अंकित कया गया है । वास्तव में राधा-कृष्ण का सामीप्य केवल बाल्यवस्था का, उनके मधुपुरी जाने से पूर्व का है।
उस की भंगिमा भिन्न है। अलग रह कर वह गहराता जाता है। उसके बाद एक बार दोनों की भेंट तब होती है प्रभास तीर्थ में ब्रज भूमि से गोपों की एक टोली भी आई है । यहाँ पत्नी और सखी का अंतर साने आता है ।
रुक्मिणी अधिकार संपन्ना है विवाहिता, पटरानी, संतान की जननी । पर कहीं बहुत विवश है । इतना ही विवश राधा का पति रहा होगा, यद्यपि उसका वर्णन कहीं नहीं मिलता । पत्नी जानना चाहती है, पति की बचपन की सखी, जो आज भी उसके मन में विराजती है, कैसी है। एक साधारण गोपबाला कैसे इतनी महत्वपूर्ण हो गई ? वह कृष्ण से पूछती है 'बालापन' की जोरी के विषय में ।
वे इशारा करते हैं - वह ठाड़ी उन जुवति वृन्द मँह नीलवसन तन गोरी ।' लोकाचार में रुक्मिणी कहाँ पीछे थीं, राधा से प्रीतिपूर्वक भेंटीं 'बहुत दिनन की बिछुरी जैसे एक बाप की बेटी। ' (- सूरदास) पर सौतिया डाह तो सगी बहनों में भी द्वेष भर देता है।
रुक्मिणी ने राधा को निमंत्रित किया - मन में कहीं था कि कहाँ गाँव की छोरी राधा और कहाँ द्वारकाधीश कृष्ण का यह ऐश्वर्य ! देख कर चौंधिया जायेंगी उसकी आँखें ।कृष्ण ने उनके आगमन के उपलक्ष्य में पुर की नवीन साज-सज्जा करवाई ।
अपनी बालसखी को रथ पर बैठा कर पुर का भ्रमण जो करवाना था ।आतिथ्य के प्रति रुक्मिणी अति सजग रही - कृष्ण से पूछ-पूछ कर राधा की रुचियाँ जानी । रानियों की दृष्टि उसकी की वेष-भूषा पर टिकी है -सतरँग लहंगा, नीली ओढ़नी, कानों में कर्ण फूल,कंठ में वनफूलों की माला पहने है राधा! मुख पर सौम्य शान्ति और परम तुष्टि !
उसके अभौतिक लगते रूप के आगे रानियों के रूप-श्रृंगार फीके लगने लगे। टीस सी उठी रुक्मिणी के हृदय में । आठों पटरानियों की देख-रेख में छप्पन भोगों की रसोई बनी । राधा भोजन करने बैठी । कृष्ण की चाव भरी दृछ्टि राधा के मुख पर! उसके मुख के ग्रास का स्वाद क्या श्याम को आ रहा है ! '
तुम भी खाओ न मोहन, बस मुझे ही खिलाते रहोगे !'
ऐसे चाव से कभी पत्नियों को खिलाया था !नहीं, पत्नी तो पति को खिला कर स्वयं तृप्त पाती है और श्याम राधा के भोग से स्वयं तृप्त हो रहे हैं । कृष्ण ने कहा था तुम पत्नी हो सब अधिकार प्राप्त प्रिये ,राधा अतिथि है। आई है चली जायेगी, क्या ले जायेगी तुम्हारा !?
रुक्मिणी ने गहरी साँस भरी -क्या ले जायेगी ? तुम्हारे मन का जो कोना सुरक्षित है उस के लिये ! वहा मैं नहीं हूँ । केवल वही विराज रही है । इस भाव भरे अभिनन्दन के लिये क्या नहीं निछावर किया जा सकता !सौभाग्यशालिनी है राधा कि कृष्ण के सारे एकान्त क्षण उसे समर्पित हैं ।
कृष्ण के साथ द्वारका -भ्रमण कर लौटी राधा । भोजन कर शैया पर विराजीं ,रुक्मिणी स्वयं दुग्ध का पात्र लेकर पहुँचीं, 'लो बहिन ,स्वामी को अब तक स्मरण है कि रात्रि-शयन से पूर्व तुम दुग्धपान करती हो। कहीं चूक न हो जाये उन का विशेष आग्रह है ।'
मनमोहन का उल्लेख सुन आत्मलीन राधा मुस्कराईं और पात्र हाथ में ले झटपट दूध पी लिया ,रुक्मिणी स्वयं खड़ी थीं रिक्त पात्र लेने के लिये । रात में रुक्मिणी ने पाया कृष्ण के चरणों में छाले पड़े है ।'क्या बिना उपानह पैदल पुरी घुमाते रहे उन्हें, जो चरणों छाले डाल लाये ?' वाणी में किंचित तीक्ष्णता थी।
पत्नी की मुख मुद्रा देखते रहे कुछ पल वे ,उनके मन मे क्या चल रहा है वह नहीं अनुमान पाई ।'तुमने राधा को इतना गर्म दूध पिला दिया ? सारे किये- धरे पर पानी फिर गया हो जैसे - रुक्मिणी एकदम अवाक् ,हतप्रभ ।
आगे पूछने -कहने को बचा ही क्या था !

एक राधा और कृष्ण का आकर्षक अनेक रंगों और रूपों में चित्रित हुआ है।
'कर मोहन सों यारी, हे राधा प्यारी !'
जब मोहन ने खर्चा भेजा चार मोहर एक सारी
एक सारी पहन राधा मँदिर में भैठीं ङँस रहे लोग-लुगाई !
जब मोहन ने पाती भेजी लिख दिया प्यारी प्यारी एक '
लोक-मन ने उनके प्रेम को कभी स्वकीया की मान्यता नहीं दी इसीलिये इस गीत में पत्र और खर्चा भेजने की बात हैं । हर युग अपनी मान्यताओं के अनुरूप अभिव्यक्ति देता रहा और यह संबंध स्वकीया से भी अधिक दृढ़ और विश्वसनीय होकर सर्वस्वीकृत हो गया । पारस्परिक निष्ठा और गहनता ने उसे मान दिया उसे पूजा की वस्तु बना दिया ।
अपनी पत्नियों के साथ कृष्ण के मन्दिर कहीं हों या न हों राधा के साय़ वे हर मंदिर और हर गीत में जुड़े रहे हैं । उनका प्रेम शारीरिकता और सामाजिकता की सीमा से परे था । परकीया या मित्रता जो जैसा माने ! राधाकृष्म के प्रेम को कितने भावों में कितने रूपों में अंकित कया गया है । वास्तव में राधा-कृष्ण का सामीप्य केवल बाल्यवस्था का, उनके मधुपुरी जाने से पूर्व का है।
उस की भंगिमा भिन्न है। अलग रह कर वह गहराता जाता है। उसके बाद एक बार दोनों की भेंट तब होती है प्रभास तीर्थ में ब्रज भूमि से गोपों की एक टोली भी आई है । यहाँ पत्नी और सखी का अंतर साने आता है ।
रुक्मिणी अधिकार संपन्ना है विवाहिता, पटरानी, संतान की जननी । पर कहीं बहुत विवश है । इतना ही विवश राधा का पति रहा होगा, यद्यपि उसका वर्णन कहीं नहीं मिलता । पत्नी जानना चाहती है, पति की बचपन की सखी, जो आज भी उसके मन में विराजती है, कैसी है। एक साधारण गोपबाला कैसे इतनी महत्वपूर्ण हो गई ? वह कृष्ण से पूछती है 'बालापन' की जोरी के विषय में ।
वे इशारा करते हैं - वह ठाड़ी उन जुवति वृन्द मँह नीलवसन तन गोरी ।' लोकाचार में रुक्मिणी कहाँ पीछे थीं, राधा से प्रीतिपूर्वक भेंटीं 'बहुत दिनन की बिछुरी जैसे एक बाप की बेटी। ' (- सूरदास) पर सौतिया डाह तो सगी बहनों में भी द्वेष भर देता है।
रुक्मिणी ने राधा को निमंत्रित किया - मन में कहीं था कि कहाँ गाँव की छोरी राधा और कहाँ द्वारकाधीश कृष्ण का यह ऐश्वर्य ! देख कर चौंधिया जायेंगी उसकी आँखें ।कृष्ण ने उनके आगमन के उपलक्ष्य में पुर की नवीन साज-सज्जा करवाई ।
अपनी बालसखी को रथ पर बैठा कर पुर का भ्रमण जो करवाना था ।आतिथ्य के प्रति रुक्मिणी अति सजग रही - कृष्ण से पूछ-पूछ कर राधा की रुचियाँ जानी । रानियों की दृष्टि उसकी की वेष-भूषा पर टिकी है -सतरँग लहंगा, नीली ओढ़नी, कानों में कर्ण फूल,कंठ में वनफूलों की माला पहने है राधा! मुख पर सौम्य शान्ति और परम तुष्टि !
उसके अभौतिक लगते रूप के आगे रानियों के रूप-श्रृंगार फीके लगने लगे। टीस सी उठी रुक्मिणी के हृदय में । आठों पटरानियों की देख-रेख में छप्पन भोगों की रसोई बनी । राधा भोजन करने बैठी । कृष्ण की चाव भरी दृछ्टि राधा के मुख पर! उसके मुख के ग्रास का स्वाद क्या श्याम को आ रहा है ! '
तुम भी खाओ न मोहन, बस मुझे ही खिलाते रहोगे !'
ऐसे चाव से कभी पत्नियों को खिलाया था !नहीं, पत्नी तो पति को खिला कर स्वयं तृप्त पाती है और श्याम राधा के भोग से स्वयं तृप्त हो रहे हैं । कृष्ण ने कहा था तुम पत्नी हो सब अधिकार प्राप्त प्रिये ,राधा अतिथि है। आई है चली जायेगी, क्या ले जायेगी तुम्हारा !?
रुक्मिणी ने गहरी साँस भरी -क्या ले जायेगी ? तुम्हारे मन का जो कोना सुरक्षित है उस के लिये ! वहा मैं नहीं हूँ । केवल वही विराज रही है । इस भाव भरे अभिनन्दन के लिये क्या नहीं निछावर किया जा सकता !सौभाग्यशालिनी है राधा कि कृष्ण के सारे एकान्त क्षण उसे समर्पित हैं ।
कृष्ण के साथ द्वारका -भ्रमण कर लौटी राधा । भोजन कर शैया पर विराजीं ,रुक्मिणी स्वयं दुग्ध का पात्र लेकर पहुँचीं, 'लो बहिन ,स्वामी को अब तक स्मरण है कि रात्रि-शयन से पूर्व तुम दुग्धपान करती हो। कहीं चूक न हो जाये उन का विशेष आग्रह है ।'
मनमोहन का उल्लेख सुन आत्मलीन राधा मुस्कराईं और पात्र हाथ में ले झटपट दूध पी लिया ,रुक्मिणी स्वयं खड़ी थीं रिक्त पात्र लेने के लिये । रात में रुक्मिणी ने पाया कृष्ण के चरणों में छाले पड़े है ।'क्या बिना उपानह पैदल पुरी घुमाते रहे उन्हें, जो चरणों छाले डाल लाये ?' वाणी में किंचित तीक्ष्णता थी।
पत्नी की मुख मुद्रा देखते रहे कुछ पल वे ,उनके मन मे क्या चल रहा है वह नहीं अनुमान पाई ।'तुमने राधा को इतना गर्म दूध पिला दिया ? सारे किये- धरे पर पानी फिर गया हो जैसे - रुक्मिणी एकदम अवाक् ,हतप्रभ ।


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my khanha sawpp diya ess jeevan ko sri appke kamal charno me
...¸.·´¯)✿✿(¯`·.¸ ♥✿ ✿ ...¸.·'¯) (¯`·. ♥ ♥ - ¯ `• ♥ • ♫ ♥'¯).--v
सुनि कान्हा तेरी बांसुरी 
बांसुरी तेरी जादू भरी 

सारा गोकुल लगा झूमने
क्या अजब मोहिनी छा गयी 
मुग्ध यमुना थिरकने लगी
तान बंसी की तड़पा गयी
मैं तो जैसे हुई बावरी 
सुनि कान्हा तेरी बांसुरी 
बांसुरी तेरी जादू भरी 

हौले से कोई धुन छेड के
तेरी बंसी तो चुप हो गयी
सात  स्वर के भंवर में  कहीं 
मेरे मन की कली खो गयी
छवि मन में बसी सांवरी 

सुनि कान्हा तेरी बांसुरी 
बांसुरी तेरी जादू भरी